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याकूब की फांसी और सियासत के बीच सोशल मीडिया

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yak

मुबंई की टाडा अदालत ने जैसे ही  याकूब मेमन की फांसी के लिए 30 जुलाई, 2015 की तारीख तय की तो अगले दो दिनों तक खबर अखबारों और टीवी में सुर्खियों के तौर पर रही। लेकिन फिर 21 जुलाई तक (सुप्रीम कोर्ट द्वारा क्यूरेटिव पीटिशन खारिज होने तक) खबर रही तो सिर्फ अखबारों के बीच के पृष्ठों पर। फांसी को लेकर असली विवाद और राजनीति तब शुरू हो गई है जब 23 जुलाई को पूर्व रॉ अफसर का लेख सामने आया है जो याकूब की गिरफ्तारी के ऑपरेशन को कॉर्डिनेट कर रहे थे। लेख में जो मुख्य बात थी वो यह थी कि जांच एजंसियों के साथ याकूब का सहयोग, अपने परिवार को पाकिस्तान से लाने का प्रयास और आत्मसमर्पण का मामला उसकी फांसी की सजा पर सवाल उठाने लायक है। मेरी राय में विभिन्न हालात के आधार पर यह सोचने वाली बात है कि क्या उसकी फांसी की सजा पर अमल होना चाहिए हांलाकि लेख की  प्रमाणिकता और समय पर भी सवाल उठ सकते थे क्योंकि इसी केस से जुडे दूसरे अधिकारी ने रमन की बातों को सिरे से खारिज कर दिया।

लेकिन बस फिर क्या था सबसे पहले उसी रात को एमआईएम के मुखिया असुद्दीन ओवैसी ने फांसी को एक जाति धर्म से जोड़ते हुए यह कहकर याकूब का बचाव किया कि अगर याकूब को फांसी होती है तो राजीव गांधी के हत्यारों और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह हत्याकांड के दोषी बलवंत सिंह राजोआणा और एक अन्य आतंकवादी भुल्लर को भी फांसी होनी चाहिए। बस फिर क्या था अगले दिन से लगातार अभी तक (1 अगस्त) इसी बात पर एक बहस सी चल पडी की क्या एक सभ्य समाज में फांसी की सजा सही है? अगर बहस इसी सवाल पर होती तो शायद तब भी ठीक था, लेकिन अगले ही दिन से बहस दो भागों में बट गयी, एक तरफ कई प्रबुद्धजन और नामी गिरामी लोग यह कहने लग गये कि अगर याकूब को फांसी हो रही है तो माया कोडडानी, बाबू बजरंगी, अजमेर ब्लास्ट, और समझौता एक्सप्रेस के दोषियों को क्यू नहीं?  ये वही लोग थे जो यह कहते फिर रहे हैं कि वो फांसी का विरोध कर रहे हैं किसी शख्स विशेष का नहीं लेकिन सवाल यह उठता है अगर शख्स विशेष का विरोध नहीं है तो फिर इनको भी फांसी देने की वकालत क्यों? क्योंकि फांसी का विरोध हो रहा है तो वो सबके केस में होना चाहिए और यहीं से बहस दो धर्म विशेष में डायवर्ट होती रही।

जिन आरोपियों का नाम लेकर याकूब की तुलना होने लगी उन सब की सजा अदालत द्वारा ही दी गयी है. रहा सवाल याकूब का तो तमाम वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जितनी सक्रियता फांसी होने के एक हफ्ता पहले तब दिखाई जब मीडिया में मामला ज्यादा गर्म हुआ, अगर यही सक्रियता तो पहले दिखाते तो शायद और मौके भी मिल सकते थे।

23 जुलाई से कई अखबारों में याकूब के पक्ष में भी खूब कॉलम लिखे गये (विशेषकर कुछ अंग्रेजी अखबार) जैसे वो एक ऐसा बेचारा हो जिसे जबरन फांसी के फंदे में धकेला जा रहा हो, तमाम टीवी डिबटों में याकूब ही याकूब छाया रहा। इन सबके बीच में किसी भी टीवी चैनल ने (1-2 को छोड) 93 के ब्लास्ट पीडितो की एक बाईट लेने की जरूरत नहीं समझी जिन्होंने अपने सपने और अपने दोनों इस ब्लास्ट में खो दिये थे।

इन तमाम बातों के बीच असली लडाई शुरू हुई सोशल मीडिया पर भी जहां भी फांसी की सजा को लेकर कम लेकिन याकूब की फांसी के विरोध और पक्ष में एक मुहिम सी चल पडीं जिसमें प्रबुद्ध विचारक, जाने-माने पत्रकार, वकील और राजनेता, फिल्मी सितारों से लेकर तमाम वर्गों आ खडे  हुए। और कुछ जाने माने वकील और संपादक ने तो कोर्ट के फैसले पर भी अंगुली उठाई और अपनी सोशल साईट पर यह तक लिखा कि कानून वाकई अंधा होता है। पक्ष और विरोध में तर्क और कुतर्कों का दौर खूब चला पुराने डाटा खंगाल कर सोशल मीडिय़ा में सर्कुलेट होने लग गये (हांलाकि यही तर्क कोर्ट के सामने नहीं चले थे, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था)। और 40 लोगों ने राष्ट्रपति को याकूब की फांसी की सजा माफी के लिए ज्ञापन सौंपा बस फिर क्या था दूसरी तरफ फांसी का समर्थन कर रहे लोगों ने सोशल मीडिया और व्हाट्स अप के जरिये 40 लोगों की ऐसी लिस्ट तैयार कर दी जिसमें अधिकांश नाम गलत थे और इन नामों को व्हट्स अप के जरिये खूब फैलाया गया कि ये राष्ट्र विरोधी हैं।

लोकतंत्र में आप किसी की बात से सहमत या असहमत हो सकते हैं लेकिन किसी निर्णय से असहमति या विरोध का मतलब ये तो नहीं हो सकता कि वो राष्ट्रविरोधी हैं। उदाहरण के तौर पर नामी गिरामी वकील इंदिरा जय सिंह जिन्होंने याकूब की फांसी के खिलाफ रात 11 बजे सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के घर पर दस्तक दी, ये वही वकील हैं जिन्होंने निठारी के नरपिचाश सुरेंद्र कोली की फांसी का विरोध किया था जो सुरेंद्र कोली को 12 सितंबर 2014 को मेरठ जेल होनी तय थी बल्कि इंदिरा जयसिंह रात डेढ़ बजे प्रधान न्यायाधीश एच.एल. दत्तू साहब के घर पहुंच गई। रात की उस घड़ी में भी प्रधान न्यायाधीश ने फांसी पर रोक लगा दी। मीडिया को सुबह तक इसकी भनक नहीं लगी। बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 29 जनवरी 2015 को सुरेंद्र कोली की फांसी को उम्रकैद में तब्दील कर दिया। तो क्या उस समय वो राष्ट्रभक्त और और राष्ट्रविरोधी हो गयीं? सवाल है हमारी मानसिकता और सलेक्टिव नजरिये का।

लेकिन यहां वो लोग भी याकूब की फांसी का विरोध कर रहे थे जो इंडिया गेट पर निर्भया के हत्यारों को फांसी देने की मांग करने के लिए कैंडल मार्च निकाल रहे थे। और यही नहीं कुछ लोगों ने इसे हिंदू बनाम मुस्लिम बनाने की भी खूब कोशिश की और यह कोशिश दोनों तरफ से खूब हुई, किसी ने अपनी प्रोफाईल पिक पर याकूब का न केवल याकूब का फोटो डाला बल्कि उसे शहीद तक करार दिया। यहां तक की कोशिश की गयी कि यह फैसला कोर्ट का नहीं बल्कि केंद्र सरकार का है। एक बात और एक ओर सोशल मीडिया पर जहां सरकार के पक्ष में कुछ ऐसे लोग हैं तो भाषाई आंतकी हैं और सम्प्रदाय विशेष के प्रति नफरत के संदेश लगातार सर्कुलेट करते रहे हैं लेकिन ऐसे लोगों की भी कमी नहीं हैं जो हर छोटी बड़ी घटना या फैसले को सीधे मोदी सरकार से जोड़ कर इस रेखा को खाई का रूप दे रहे हैं जो कभी भी दोनों समुदायों के लिए घातक सिद्ध हो सकती है।

इन सबके बीच में अदालत के फैसले पर भी सवाल उठने लग गये जबकि जितने मौके अदालत को याकूब ने दिये उतने शायद किसी को ही मिले हों। 28 जुलाई को 2 जजों की बेंच दिन भर रमन के लेख और याकूब की फांसी की सजा को लेकर कोर्ट में बहस होती रही लेकिन जजों में निर्णय ना होने पाने की स्थिति में इसे मुख्य न्यायाधीश ने 3 जजों की बेचं को ट्रांसफर कर दिया और अगले दिन यानि 29 जुलाई को तीन जजों की बेंच में पक्ष और विपक्ष दोनों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने याकूब की फांसी की सजा बरकरार ऱखी। और आधी रात में 4 वकीलों ने फिर चीफ जस्टिस के दरवाजे पर दस्तक दी और फिर कुछ दिनों के लिए फांसी पर रोक लगाने की मांग की और  इतिहास में पहला मौका रहा होगा जब भारतीय सर्वोच्च न्यायालय सुबह 5 बजे तक खुला रहा लेकिन तब भी सजा बरकरार रही। और अंत में याकूब को 7 बजे फांसी हो ही गई।

सवाल है फांसी की सजा का जिस पर संसद में बहस हो सकती है, कि इसे बरकरार रखा जाना चाहिए कि नहीं लेकिन इसे धर्म विशेष या सम्प्रदाय विशेष से नहीं जोडना चाहिए और याकूब के केस में यह खूब हुआ। बांकि अभी तक के इतिहास पर नजर डाले तो फांसी की सजा होने के बावजूद भी अपराधिक या आतंकी घटनाएं कम नहीं हुई है बल्कि उनमें बढोत्तरी ही हुई है जिस पर शायद गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

Web Title : याकूब की फांसी और सियासत के बीच सोशल मीडिया



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